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mahabharat 12.52.15: हे गंगापुत्र भीष्म! हे प्रभु! आपने बाणों के आघात से होने वाली पीड़ा के विषय में जो कहा है, उसके लिए आप मेरे द्वारा दिए गए इस वर को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.52.15 
यच्च मामात्थ गाङ्गेय बाणघातरुजं प्रति।
गृहाणात्र वरं भीष्म मत्प्रसादकृतं प्रभो॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे गंगापुत्र भीष्म! हे प्रभु! आपने बाणों के आघात से होने वाली पीड़ा के विषय में जो कहा है, उसके लिए आप मेरे द्वारा दिए गए इस वर को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें॥15॥
 
O son of Ganga, Bhishma! O Lord! For what you have said about the pain caused by the impact of arrows, please accept this boon given to you by me with great pleasure. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)