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mahabharat 12.52.13: ‘श्रीकृष्ण! आप जगत के रचयिता और सनातन पुरुष हैं। मुझ जैसा मनुष्य आपके समक्ष कैसे उपदेश दे सकता है? क्या शिष्य अपने गुरु के समक्ष उपदेश देने का अधिकारी है?’॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.52.13 
कथं त्वयि स्थिते कृष्णे शाश्वते लोककर्तरि।
प्रब्रूयान्मद्विध: कश्चिद् गुरौ शिष्य इव स्थिते॥ १३॥
 
 
अनुवाद
‘श्रीकृष्ण! आप जगत के रचयिता और सनातन पुरुष हैं। मुझ जैसा मनुष्य आपके समक्ष कैसे उपदेश दे सकता है? क्या शिष्य अपने गुरु के समक्ष उपदेश देने का अधिकारी है?’॥13॥
 
‘Sri Krishna! You are the creator of the world and the eternal man. How can a man like me preach in your presence? Is a disciple entitled to preach in the presence of his Guru?’॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)