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mahabharat 12.52.10: महाबाहो! मुझे क्षमा करें। मैं बोल नहीं सकता। बृहस्पतिजी भी आपके सामने बोलते-बोलते थक जाते हैं; फिर मैं क्या कर सकता हूँ?॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.52.10 
तत् क्षमस्व महाबाहो न ब्रूयां किंचिदच्युत।
त्वत्संनिधौ च सीदेद्धि वाचस्पतिरपि ब्रुवन्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! मुझे क्षमा करें। मैं बोल नहीं सकता। बृहस्पतिजी भी आपके सामने बोलते-बोलते थक जाते हैं; फिर मैं क्या कर सकता हूँ?॥10॥
 
‘Mahabaho! Please forgive me. I cannot speak. Even Brihaspatiji can get tired of talking in front of you; then what can I do?॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)