अध्याय 52: भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान् का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना
श्लोक 1: वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन ! श्रीकृष्ण के ये हितकर, अर्थ और धर्म से परिपूर्ण वचन सुनकर शान्तनुपुत्र भीष्म ने हाथ जोड़कर कहा - ॥1॥
श्लोक 2: लोकनाथ! महाबाहो! शिव! नारायण! अच्युत! आपके वचन सुनकर मैं आनंद के सागर में डूब गया हूँ॥ 2॥
श्लोक 3: अच्छा' मैं आपसे क्या कह सकता हूँ, जब वाणी का सम्पूर्ण विषय आपकी वैदिक वाणी में स्थापित है।
श्लोक 4: हे प्रभु! संसार में कहीं भी जो भी कर्तव्य किया जाता है, वह सब आपसे, हे बुद्धिमान परमेश्वर से ही प्राप्त हुआ है।
श्लोक 5: जो व्यक्ति इंद्रदेव को स्वर्गलोक की कथाएँ सुनाने का साहस कर सकता है, वही आपसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की बातें कह सकता है। ॥5॥
श्लोक 6: मधुसूदन! इन बाणों की जलन से मुझे बड़ी पीड़ा हो रही है। पीड़ा के कारण मेरा सारा शरीर दुर्बल हो गया है और मेरा मन बिल्कुल भी काम नहीं कर रहा है।॥6॥
श्लोक 7: गोविन्द! ये बाण विष और अग्नि के समान हैं, जो मुझे निरन्तर पीड़ा दे रहे हैं; इसलिए मुझमें कुछ भी कहने की शक्ति नहीं बची है॥7॥
श्लोक 8: ऐसा लग रहा है जैसे मेरी शक्ति मेरे शरीर से निकल रही है। ये लोग अपनी जान देने की जल्दी में हैं। मेरे शरीर के अंगों में बहुत दर्द हो रहा है, इसलिए मेरा मन भ्रमित हो गया है।
श्लोक 9: दुर्बलता के कारण मेरी जीभ तालू से चिपक गई है, ऐसी अवस्था में मैं कैसे बोल सकता हूँ? हे दशार्ह वंश की वृद्धि करने वाले प्रभु, मुझ पर पूर्ण प्रसन्न होइए॥9॥
श्लोक 10: महाबाहो! मुझे क्षमा करें। मैं बोल नहीं सकता। बृहस्पतिजी भी आपके सामने बोलते-बोलते थक जाते हैं; फिर मैं क्या कर सकता हूँ?॥10॥
श्लोक 11: मधुसूदन! मैं न तो दिशाओं को जानता हूँ, न आकाश और पृथ्वी को जानता हूँ। मैं केवल आपके प्रभाव से ही जीवित हूँ॥ 11॥
श्लोक 12: अतः आप ही शीघ्र ही मुझसे वह बात कहिए जो धर्मराज के हित में हो; क्योंकि आप शास्त्रों के भी शास्त्र हैं। ॥12॥
श्लोक 13: ‘श्रीकृष्ण! आप जगत के रचयिता और सनातन पुरुष हैं। मुझ जैसा मनुष्य आपके समक्ष कैसे उपदेश दे सकता है? क्या शिष्य अपने गुरु के समक्ष उपदेश देने का अधिकारी है?’॥13॥
श्लोक 14: भगवान् श्रीकृष्ण बोले- भीष्मजी! आप कुरुकुल का भार वहन करने वाले, पराक्रमी, अत्यंत धैर्यवान, स्थिरचित्त और सर्वदर्शी हैं; आपका यह कथन सर्वथा युक्तिसंगत है॥14॥
श्लोक 15: हे गंगापुत्र भीष्म! हे प्रभु! आपने बाणों के आघात से होने वाली पीड़ा के विषय में जो कहा है, उसके लिए आप मेरे द्वारा दिए गए इस वर को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें॥15॥
श्लोक 16: गंगाकुमार! अब तुम्हें न तो पश्चाताप होगा, न मूर्छा आएगी; न तुम्हें दाह होगा, न रोग होगा; न तुम्हें भूख लगेगी, न प्यास लगेगी॥ 16॥
श्लोक 17: अनघ! तुम्हारे अन्तःकरण में सम्पूर्ण ज्ञान प्रकट हो जाएगा। तुम्हारी बुद्धि किसी भी विषय में कुंठित नहीं होगी॥ 17॥
श्लोक 18: भीष्म! बादलों के आवरण से मुक्त चन्द्रमा की भाँति तुम्हारा मन भी सदैव रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होकर सत्त्वगुण में स्थित रहेगा। 18॥
श्लोक 19: जो भी विषय तुम धर्ममय या अर्थपूर्ण हो, उसका चिंतन करोगे, तुम्हारी बुद्धि उसी में सफलतापूर्वक प्रगति करेगी ॥19॥
श्लोक 20: हे महान् एवं पराक्रमी राजा! दिव्य दृष्टि प्राप्त होने से आप चारों प्रकार के प्राणियों को देख सकेंगे - पसीने से उत्पन्न, अण्डज जन्तुओं से उत्पन्न, वनस्पतियों से उत्पन्न तथा गर्भ से उत्पन्न।
श्लोक 21: भीष्म! ज्ञानदृष्टि से संपन्न होकर तुम संसार में फंसे हुए समस्त प्राणी समुदाय को उसी प्रकार सत्यस्वरूप से देख सकोगे, जैसे मछली स्वच्छ जल में सब कुछ देख लेती है।
श्लोक 22: वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन् ! तत्पश्चात् व्यास आदि सभी महर्षियों ने ऋक्, यजु और सामवेद के मन्त्रों से भगवान श्रीकृष्ण की आराधना की ॥22॥
श्लोक 23: तत्पश्चात, जहाँ वृष्णिवंशी भगवान श्रीकृष्ण, गंगापुत्र भीष्म और पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर के साथ विराजमान थे, वहाँ आकाश से सभी ऋतुओं में खिलने वाले दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी॥23॥
श्लोक 24: सब प्रकार के बाजे बजने लगे, अप्सराओं का समूह गान करने लगा, वहाँ कोई भी अनिष्ट या अशुभ वस्तु दिखाई नहीं दी॥ 24॥
श्लोक 25: शीतल, सुखद, मंद, शुद्ध और पूर्णतया सुगन्धित वायु बह रही थी, समस्त दिशाएँ शान्त थीं और उनमें रहने वाले पशु-पक्षी शान्तिपूर्वक मधुर वाणी बोल रहे थे।
श्लोक 26: ठीक इसी समय, मात्र दो घण्टों में, सहस्त्र किरणों वाले भगवान सूर्य पश्चिम दिशा में एक निर्जन प्रदेश में प्रकट हुए और वहाँ के वन को जला डाला।
श्लोक 27: तब सभी महर्षि उठ खड़े हुए और भगवान श्रीकृष्ण, भीष्म और राजा युधिष्ठिर से विदा ली।
श्लोक 28: तत्पश्चात् श्रीकृष्ण, सात्यकि, संजय और शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य सहित पाण्डवों ने उन सबको प्रणाम किया॥28॥
श्लोक 29: उनके द्वारा भली-भाँति पूजित होकर पुण्यात्मा महर्षियों ने कहा, 'हम कल प्रातःकाल पुनः यहाँ आएंगे' और तुरन्त ही अपने इच्छित स्थानों को चले गए।
श्लोक 30: इसी प्रकार श्रीकृष्ण और पाण्डव भी गंगानन्दन भीष्मजी से अनुमति लेकर उनकी परिक्रमा करके अपने शुभ रथों पर बैठ गए॥30॥
श्लोक 31-32: वह विशाल सेना, जिसमें विचित्र कूबड़ वाले सोने के बने रथ, पर्वत के समान उन्मत्त हाथी, गरुड़ के समान वेग से चलने वाले घोड़े और हाथ में धनुष-बाण लिए पैदल सैनिक थे, रथों के आगे और पीछे दूर तक फैलकर ऐसी शोभायमान होने लगी, जैसे पूर्व और पश्चिम दिशा में बहने वाली महान नदी नर्मदा ऋषवान पर्वत पर पहुंचकर शोभायमान होती है।
श्लोक 33: इसके बाद भगवान चन्द्रमा उस सेना के आनन्द को बढ़ाते हुए पूर्व आकाश में उदित हुए और अपनी अमृतमयी किरणों के द्वारा उन समस्त औषधियों को, जिनका रस सूर्य ने चूस लिया था, पुनः उनके स्वाभाविक गुणों से युक्त कर रहे थे।
श्लोक 34: तत्पश्चात् वह यदुकुल में श्रेष्ठ योद्धा तथा पाण्डव सुरपुर के समान शोभायमान हस्तिनापुर में प्रवेश कर गया और अपनी क्षमता के अनुसार उत्तम महलों के भीतर चला गया, जैसे थके हुए सिंह विश्राम के लिए पर्वत की गुफाओं में प्रवेश करते हैं॥34॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥