श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 51: भीष्मके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका भीष्मकी प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश करनेका आदेश  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.51.9 
त्वत्प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे।
यच्छ्रेय: पुण्डरीकाक्ष तद् ध्यायस्व सुरोत्तम॥ ९॥
 
 
अनुवाद
मैं आपका शरणागत भक्त हूँ और अभीष्ट गति प्राप्त करना चाहता हूँ। हे कमलनेत्र! देवश्रेष्ठ! आप मेरे लिए जो भी कल्याणकारी हो, उसका संकल्प करें॥ 9॥
 
I am your devotee who has taken refuge in you and I want to achieve the desired destination. O lotus-eyed one! Best of the gods! Please resolve on whatever will be beneficial for me.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)