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mahabharat 12.49.89: वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन् ! धर्मात्माओं में श्रेष्ठ यदुकुल-तिलक महात्मा श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से इस प्रकार बात करते हुए भगवान सूर्य के समान सम्पूर्ण दिशाओं में प्रकाश फैलाते हुए उस रथ पर शीघ्रतापूर्वक चले ॥89॥   |   mahabharat अध्याय 12.49: परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 49: परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  12.49.89 
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवंस्तं च यदुप्रवीरो
युधिष्ठिरं धर्मभृतां वरिष्ठम्।
रथेन तेनाशु ययौ महात्मा
दिश: प्रकाशन् भगवानिवार्क:॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन् ! धर्मात्माओं में श्रेष्ठ यदुकुल-तिलक महात्मा श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से इस प्रकार बात करते हुए भगवान सूर्य के समान सम्पूर्ण दिशाओं में प्रकाश फैलाते हुए उस रथ पर शीघ्रतापूर्वक चले ॥89॥
 
Vaishampayanji says – King! While conversing thus with Yudhishthira, the best among the religious souls, Yadukul-Tilak Mahatma Shri Krishna proceeded quickly in that chariot, spreading light in all directions like Lord Sun. 89॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि रामोपाख्याने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें परशुरामोपाख्यानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)