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mahabharat 12.49.86: हे महर्षि! मुझे उन राजाओं के वंशजों का सम्मान करना चाहिए ताकि मैं उनका ऋण चुका सकूँ। मैं ऐसे क्षत्रिय से सुरक्षा नहीं चाहता जो धर्म की सीमा का उल्लंघन करता हो। मैं ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा में रहना चाहता हूँ जो अपने धर्म में दृढ़ है; अतः कृपया शीघ्र ही इसकी व्यवस्था करें। 86   |   mahabharat अध्याय 12.49: परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 49: परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  12.49.86 
तेषामपचितिश्चैव मया कार्या महामुने।
न ह्यहं कामये नित्यमतिक्रान्तेन रक्षणम्।
वर्तमानेन वर्तेयं तत् क्षिप्रं संविधीयताम्॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
हे महर्षि! मुझे उन राजाओं के वंशजों का सम्मान करना चाहिए ताकि मैं उनका ऋण चुका सकूँ। मैं ऐसे क्षत्रिय से सुरक्षा नहीं चाहता जो धर्म की सीमा का उल्लंघन करता हो। मैं ऐसे व्यक्ति की सुरक्षा में रहना चाहता हूँ जो अपने धर्म में दृढ़ है; अतः कृपया शीघ्र ही इसकी व्यवस्था करें। 86
 
O great sage! I must honour these descendants of those kings in order to repay my debt to them. I do not want protection from a Kshatriya who has crossed the limits of Dharma. I wish to live under the protection of one who is steadfast in his Dharma; therefore, please arrange for this soon. 86.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)