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mahabharat 12.49.56-59: महाराज! विश्वामित्र के पौत्र और रैभ्य के पुत्र परम पराक्रमी परावसु ने सभा में आपत्ति उठाते हुए कहा- 'राम! राजा ययाति के स्वर्ग से गिर जाने के समय यज्ञ में एकत्रित हुए प्रतर्दन आदि श्रेष्ठ पुरुष क्या क्षत्रिय नहीं थे? आपकी प्रतिज्ञा झूठी है। आप सभा में व्यर्थ ही यह शेखी बघार रहे हैं कि आपने क्षत्रियों का नाश कर दिया है। मैं तो यही समझता हूँ कि आपने क्षत्रिय योद्धाओं के भय से ही पर्वत की शरण ली है। इस समय पृथ्वी पर फिर से सैकड़ों क्षत्रिय भर गए हैं।'॥56-59॥   |   mahabharat अध्याय 12.49: परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 49: परशुरामजीके उपाख्यानमें क्षत्रियोंके विनाश और पुन: उत्पन्न होनेकी कथा  »  श्लोक 56-59
 
 
श्लोक  12.49.56-59 
विश्वामित्रस्य पौत्रस्तु रैभ्यपुत्रो महातपा:॥ ५६॥
परावसुर्महाराज क्षिप्त्वाऽऽह जनसंसदि।
ये ते ययातिपतने यज्ञे सन्त: समागता:॥ ५७॥
प्रतर्दनप्रभृतयो राम किं क्षत्रिया न ते।
मिथ्याप्रतिज्ञो राम त्वं कत्थसे जनसंसदि॥ ५८॥
भयात् क्षत्रियवीराणां पर्वतं समुपाश्रित:।
सा पुन: क्षत्रियशतै: पृथिवी सर्वत: स्तृता॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
महाराज! विश्वामित्र के पौत्र और रैभ्य के पुत्र परम पराक्रमी परावसु ने सभा में आपत्ति उठाते हुए कहा- 'राम! राजा ययाति के स्वर्ग से गिर जाने के समय यज्ञ में एकत्रित हुए प्रतर्दन आदि श्रेष्ठ पुरुष क्या क्षत्रिय नहीं थे? आपकी प्रतिज्ञा झूठी है। आप सभा में व्यर्थ ही यह शेखी बघार रहे हैं कि आपने क्षत्रियों का नाश कर दिया है। मैं तो यही समझता हूँ कि आपने क्षत्रिय योद्धाओं के भय से ही पर्वत की शरण ली है। इस समय पृथ्वी पर फिर से सैकड़ों क्षत्रिय भर गए हैं।'॥56-59॥
 
Maharaj! The very powerful Paravasu, grandson of Vishwamitra and son of Raibhya, raised an objection in the assembly and said- 'Rama! At the time of King Yayati's fall from heaven, were the noble men like Pratrdan etc. who had gathered in the yajna, not Kshatriyas? Your promise is false. You are vainly boasting in the public assembly that you have destroyed the Kshatriyas. I think that you have taken refuge in the mountain only out of fear of the Kshatriya warriors. At this time, hundreds of Kshatriyas have again filled up all over the earth.'॥ 56-59॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)