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यह स्तोत्रराज पापियों के समस्त पापों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य पवित्र भाव से इसका पाठ करता है, वह संसार के बंधन से मुक्त होने की इच्छा रखता है, वह पवित्र सनातन लोकों को भी पार कर भगवान श्रीकृष्ण के अमृतमय धाम को प्राप्त होता है।
This Stotraraj is the destroyer of all the sins of the sinners. The person who recites it with a sacred spirit, desirous of being free from the bondage of the world, transcends even the pure eternal worlds and goes to the nectar-filled abode of Lord Krishna.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीष्मस्तवराजे सप्तचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीष्मस्तवराजविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४७॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल १४२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥