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mahabharat 12.47.d29: जो विद्युत रूप से मेघों में तथा जठराग्नि रूप से उदर में स्थित हैं, जो सबको पवित्र करने के कारण शुद्ध हैं तथा शुद्ध स्वरूप होने के कारण 'शुचि' कहलाते हैं, जो समस्त भक्ष्य पदार्थों को जला देने वाले अग्निदेव के स्वरूप हैं, उन तेजस्वरूप भगवान को नमस्कार है।   |   mahabharat अध्याय 12.47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक d29
 
 
श्लोक  12.47.d29 
(वैद्युतो जाठरश्चैव पावक: शुचिरेव च।
दहन: सर्वभक्षाणां तस्मै वह्नॺात्मने नम:॥ )
 
 
अनुवाद
जो विद्युत रूप से मेघों में तथा जठराग्नि रूप से उदर में स्थित हैं, जो सबको पवित्र करने के कारण शुद्ध हैं तथा शुद्ध स्वरूप होने के कारण 'शुचि' कहलाते हैं, जो समस्त भक्ष्य पदार्थों को जला देने वाले अग्निदेव के स्वरूप हैं, उन तेजस्वरूप भगवान को नमस्कार है।
 
Salutations to the fiery God who is present in the clouds in the form of electricity and in the stomach in the form of the gastrointestinal tract, who is pure because of purifying everyone and is called 'Shuchi' because of being pure in form, who is the form of Agnidev, who burns all the edible items.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)