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mahabharat 12.47.d25-d26: मैं उन श्री नारायणदेव की शरण लेता हूँ, जो हजारों नेत्रों वाले हैं, सम्पूर्ण लोकों के महेश्वर हैं, हिरण्यनाभ, यज्ञस्वरूप हैं, अमृत से भरे हुए हैं, सब ओर मुख वाले हैं और कमल-नेत्र वाले पुरुषोत्तम हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक d25-d26
 
 
श्लोक  12.47.d25-d26 
नारायणं सहस्राक्षं सर्वलोकमहेश्वरम्॥
हिरण्यनाभं यज्ञाङ्गममृतं विश्वतोमुखम्।
प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षं प्रपद्ये पुरुषोत्तमम्॥
 
 
अनुवाद
मैं उन श्री नारायणदेव की शरण लेता हूँ, जो हजारों नेत्रों वाले हैं, सम्पूर्ण लोकों के महेश्वर हैं, हिरण्यनाभ, यज्ञस्वरूप हैं, अमृत से भरे हुए हैं, सब ओर मुख वाले हैं और कमल-नेत्र वाले पुरुषोत्तम हैं।
 
I take refuge in Shri Narayanadev, the one who has thousands of eyes, Maheshwar of all the worlds, Hiranyanabh, form of Yagya, nectar-filled, having faces on all sides and the lotus-eyed Purushottam.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)