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mahabharat 12.47.84: जिनमें सब कुछ स्थित है, जिनसे सब कुछ उत्पन्न होता है, जो स्वयं सर्वव्यापी हैं, जो सर्वत्र व्याप्त हैं और सर्वत्र व्याप्त हैं, उन परमात्मा को नमस्कार है ॥ 84॥   |   mahabharat अध्याय 12.47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  12.47.84 
यस्मिन् सर्वं यत: सर्वं य: सर्वं सर्वतश्च य:।
यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नम:॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
जिनमें सब कुछ स्थित है, जिनसे सब कुछ उत्पन्न होता है, जो स्वयं सर्वव्यापी हैं, जो सर्वत्र व्याप्त हैं और सर्वत्र व्याप्त हैं, उन परमात्मा को नमस्कार है ॥ 84॥
 
Salutations to that Supreme Soul in whom everything resides, from whom everything originates, who is himself the all-pervading being, who is always pervading in all directions and is all-pervading. ॥ 84॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)