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mahabharat 12.47.66: जो प्रत्येक शरीर के भीतर वायुरूप से स्थित हैं और जो अपने को प्राण, अपान आदि पाँच रूपों में विभाजित करके समस्त प्राणियों को क्रियाशील बनाते हैं, उन वायुरूपी परमेश्वर को नमस्कार है॥66॥   |   mahabharat अध्याय 12.47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  12.47.66 
विभज्य पञ्चधाऽऽत्मानं वायुर्भूत्वा शरीरग:।
यश्चेष्टयति भूतानि तस्मै वाय्वात्मने नम:॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
जो प्रत्येक शरीर के भीतर वायुरूप से स्थित हैं और जो अपने को प्राण, अपान आदि पाँच रूपों में विभाजित करके समस्त प्राणियों को क्रियाशील बनाते हैं, उन वायुरूपी परमेश्वर को नमस्कार है॥66॥
 
Salutations to God in the form of air who is present in the form of air within every body and who divides himself into five forms like prana, apana etc. and makes all living beings active. 66॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)