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mahabharat 12.47.65: जो धर्मात्मा होते हुए भी क्रोध में आकर धर्म के अभिमान को भंग करने वाले क्षत्रिय समुदाय को युद्ध में इक्कीस बार मार गिराते थे और जो कठोर पुरुष के समान आचरण करते थे, उन भगवान परशुरामजी को नमस्कार है ॥ 65॥   |   mahabharat अध्याय 12.47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  12.47.65 
त्रि:सप्तकृत्वो य: क्षत्रं धर्मव्युत्क्रान्तगौरवम्।
क्रुद्धो निजघ्ने समरे तस्मै क्रौर्यात्मने नम:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
जो धर्मात्मा होते हुए भी क्रोध में आकर धर्म के अभिमान को भंग करने वाले क्षत्रिय समुदाय को युद्ध में इक्कीस बार मार गिराते थे और जो कठोर पुरुष के समान आचरण करते थे, उन भगवान परशुरामजी को नमस्कार है ॥ 65॥
 
Salutations to Lord Parashurama who, in spite of being a righteous man, in a fit of anger killed the Kshatriya community who violated the pride of religion, twenty-one times in the war; and who acted as a stern person. ॥ 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)