श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  12.47.64 
अकुण्ठं सर्वकार्येषु धर्मकार्यार्थमुद्यतम्।
वैकुण्ठस्य च तद् रूपं तस्मै कार्यात्मने नम:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जो स्वर्ग के स्वरूप हैं, जिन्हें किसी भी कार्य को करने में कोई बाधा नहीं होती, जो धर्म के कार्य करने में सदैव तत्पर रहते हैं, तथा जो स्वर्ग के स्वरूप हैं, उन भगवान को नमस्कार है ॥ 64॥
 
Salutations to the God who is the embodiment of the heavenly abode, who has no hindrance in doing any work, who is always ready to do the work of righteousness, and who is the embodiment of the heavenly abode. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)