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mahabharat 12.47.55: जो योगीजन निरन्तर योगाभ्यास में लगे रहते हैं, जिन्होंने प्राणों को जीत लिया है, इन्द्रियों को वश में कर लिया है और जो शुद्ध तत्त्व में स्थित हो गए हैं, जिनके तेजोमय स्वरूप का वे साक्षात्कार करते हैं, वे योगरूप परमेश्वर को नमस्कार करते हैं॥55॥   |   mahabharat अध्याय 12.47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.47.55 
यं विनिद्रा जितश्वासा: सत्त्वस्था: संयतेन्द्रिया:।
ज्योति: पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नम:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जो योगीजन निरन्तर योगाभ्यास में लगे रहते हैं, जिन्होंने प्राणों को जीत लिया है, इन्द्रियों को वश में कर लिया है और जो शुद्ध तत्त्व में स्थित हो गए हैं, जिनके तेजोमय स्वरूप का वे साक्षात्कार करते हैं, वे योगरूप परमेश्वर को नमस्कार करते हैं॥55॥
 
Those yogis who are constantly engaged in the practice of yoga, who have conquered life and have controlled the senses and have become established in the pure essence, whose luminous form they encounter, are salutations to the Supreme Lord in the form of Yoga. 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)