श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 47: भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.47.51 
यं पृथग्धर्मचरणा: पृथग्धर्मफलैषिण:।
पृथग्धर्मै: समर्चन्ति तस्मै धर्मात्मने नम:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
जो लोग भिन्न-भिन्न धर्मों का आचरण करते हैं और उन धर्मों के भिन्न-भिन्न फल की इच्छा रखते हैं, तथा ऐसे पुरुष भिन्न-भिन्न धर्मों के द्वारा जिनकी पूजा करते हैं, मैं उन धर्मस्वरूप परमेश्वर को नमस्कार करता हूँ ॥ 51॥
 
Those who practice different religious practices and desire different fruits of those practices, and whom such men worship through different religious practices, I bow to that Supreme Being who is the embodiment of Dharma. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)