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mahabharat 12.45.8: महाराज! राजा ने कृपाचार्य के साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा एक शिष्य को अपने गुरु के साथ करना चाहिए। नियमित व्रत करने वाले युधिष्ठिर ने भी विदुरजी का आदर-सत्कार किया। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.45.8 
कृपाय च महाराज गुरुवृत्तिमवर्तत।
विदुराय च राजासौ पूजां चक्रे यतव्रत:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! राजा ने कृपाचार्य के साथ वैसा ही व्यवहार किया जैसा एक शिष्य को अपने गुरु के साथ करना चाहिए। नियमित व्रत करने वाले युधिष्ठिर ने भी विदुरजी का आदर-सत्कार किया। ॥8॥
 
Maharaj! The king treated Kripacharya in the same manner as a disciple should treat his Guru. Yudhishthira, who regularly observed fasts, also respected Vidurji like a respectable person. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)