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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.45.6 
तथाऽनुजीविनो भृत्यान् संश्रितानतिथीनपि।
कामै: संतर्पयामास कृपणांस्तर्ककानपि॥ ६॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार, उन्होंने अपने सेवकों, शरणागतों और अपने आश्रित अतिथियों को उनकी इच्छानुसार भोजन देकर संतुष्ट किया। उन्होंने दीन-दुखियों और प्रश्नों के उत्तर देने वाले ज्योतिषियों को भी संतुष्ट किया।
 
In the same way, he satisfied his servants, those who sought refuge and guests whose livelihood was dependent on him by giving them food items as per their wish. He also satisfied the poor and the distressed and the astrologers who answered his questions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)