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mahabharat 12.45.20: शत्रुओं का नाश करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार बोलते रहे; परन्तु भगवान ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यान में मग्न थे।   |   mahabharat अध्याय 12.45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.45.20 
तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजमरिंदमम्।
नोवाच भगवान् किंचिद् ध्यानमेवान्वपद्यत॥ २०॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं का नाश करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार बोलते रहे; परन्तु भगवान ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यान में मग्न थे।
 
Dharmaraja Yudhishthira, the destroyer of enemies, continued speaking in this manner; but the Lord did not give him any answer. He was immersed in meditation at that time.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णं प्रति युधिष्ठिरवाक्ये पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्णके प्रति युधिष्ठिरका वचनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)