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तं तथा भाषमाणं तु धर्मराजमरिंदमम्।
नोवाच भगवान् किंचिद् ध्यानमेवान्वपद्यत॥ २०॥
अनुवाद
शत्रुओं का नाश करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार बोलते रहे; परन्तु भगवान ने उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया। वे उस समय ध्यान में मग्न थे।
Dharmaraja Yudhishthira, the destroyer of enemies, continued speaking in this manner; but the Lord did not give him any answer. He was immersed in meditation at that time.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णं प्रति युधिष्ठिरवाक्ये पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्णके प्रति युधिष्ठिरका वचनविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥