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mahabharat 12.45.16-17h: भगवान् के उस दिव्य दर्शन की तीनों लोकों में कोई उपमा नहीं थी। राजा युधिष्ठिर मनुष्य रूपधारी भगवान् विष्णु के पास गए और हँसते हुए मधुर वाणी में इस प्रकार बोले -॥16 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 45: युधिष्ठिरके द्वारा ब्राह्मणों तथा आश्रितोंका सत्कार एवं दान और श्रीकृष्णके पास जाकर उनकी स्तुति करते हुए कृतज्ञता-प्रकाशन  »  श्लोक 16-17h
 
 
श्लोक  12.45.16-17h 
नौपम्यं विद्यते तस्य त्रिषु लोकेषु किंचन।
सोऽभिगम्य महात्मानं विष्णुं पुरुषविग्रहम्॥ १६॥
उवाच मधुरं राजा स्मितपूर्वमिदं तदा।
 
 
अनुवाद
भगवान् के उस दिव्य दर्शन की तीनों लोकों में कोई उपमा नहीं थी। राजा युधिष्ठिर मनुष्य रूपधारी भगवान् विष्णु के पास गए और हँसते हुए मधुर वाणी में इस प्रकार बोले -॥16 1/2॥
 
That divine sight of the Lord had no parallel in the three worlds. King Yudhishthira went near the Supreme Being Vishnu in human form and smilingly spoke in sweet voice as follows -॥16 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)