श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 44: महाराज युधिष्ठिरके दिये हुए विभिन्न भवनोंमें भीमसेन आदि सब भाइयोंका प्रवेश और विश्राम  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.44.6-7 
ततो दुर्योधनगृहं प्रासादैरुपशोभितम्।
बहुरत्नसमाकीर्णं दासीदाससमाकुलम्॥ ६॥
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातं भ्रात्रा दत्तं वृकोदर:।
प्रतिपेदे महाबाहुर्मन्दिरं मघवानिव॥ ७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् धृतराष्ट्र की आज्ञा से भाई युधिष्ठिर ने दुर्योधन का महल भीमसेन को भेंट कर दिया। वह अनेक महलों से सुशोभित था। वहाँ अनेक प्रकार के रत्नों का भण्डार था और अनेक सेवक सेवा में तत्पर थे। जैसे इंद्र अपने महल में प्रवेश करते हैं, वैसे ही पराक्रमी भीमसेन उस महल में प्रविष्ट हुए।
 
Thereafter, on the orders of Dhritarashtra, brother Yudhishthira offered Duryodhan's palace to Bhimasena. It was decorated with many palaces. There was a storehouse of many types of gems and many servants were ready to serve. Just like Indra enters his palace, in the same way the powerful Bhimasena entered that palace. 6-7.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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