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श्लोक 12.44.3  |
शत्रुभिर्विविधै: शस्त्रै: क्षतदेहा महारणे।
श्रान्ता भवन्त: सुभृशं तापिता: शोकमन्युभि:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| ‘मित्रो! इस महायुद्ध में शत्रुओं ने नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से तुम्हारे शरीरों को घायल कर दिया है। तुम सब लोग अत्यन्त थक गए हो और शोक तथा क्रोध ने तुम्हें पीड़ा पहुँचाई है॥3॥ |
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| ‘Friends! In this great war the enemies have injured your bodies with various types of weapons. All of you are extremely tired and grief and anger have tormented you.॥ 3॥ |
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