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mahabharat 12.41.5: अपने इतने भाई-बन्धुओं को मारकर भी मैं इन्हीं महाराज के लिए जी रहा हूँ। मुझे आलस्य त्यागकर प्रतिदिन इनकी सेवा में तत्पर रहना है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.41: राजा युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोंको विभिन्न कार्योंपर नियुक्त करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 41: राजा युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोंको विभिन्न कार्योंपर नियुक्त करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.41.5 
एतदर्थं हि जीवामि कृत्वा ज्ञातिवधं महत्।
अस्य शुश्रूषणं कार्यं मया नित्यमतन्द्रिणा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अपने इतने भाई-बन्धुओं को मारकर भी मैं इन्हीं महाराज के लिए जी रहा हूँ। मुझे आलस्य त्यागकर प्रतिदिन इनकी सेवा में तत्पर रहना है ॥5॥
 
'After killing so many of my brothers and relatives, I am living for this Maharaja. I have to give up my laziness and remain engaged in serving him every day. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)