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mahabharat 12.38.35: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय! तत्पश्चात् उन समस्त शुद्धात्मा ब्राह्मणों ने क्रोध में भरकर उस पापी राक्षस को डाँटा और अपनी गर्जना से उसे नष्ट कर दिया॥35॥   |   mahabharat अध्याय 12.38: नगर-प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा वध   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 38: नगर-प्रवेशके समय पुरवासियों तथा ब्राह्मणोंद्वारा राजा युधिष्ठिरका सत्कार और उनपर आक्षेप करनेवाले चार्वाकका ब्राह्मणोंद्वारा वध  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.38.35 
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते ब्राह्मणा: सर्वे हुंकारै: क्रोधमूर्च्छिता:।
निर्भर्त्सयन्त: शुचयो निजघ्नु: पापराक्षसम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे जनमेजय! तत्पश्चात् उन समस्त शुद्धात्मा ब्राह्मणों ने क्रोध में भरकर उस पापी राक्षस को डाँटा और अपनी गर्जना से उसे नष्ट कर दिया॥35॥
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! Thereafter all those pure-souled Brahmins, filled with anger, scolded that sinful demon and destroyed him with their roars. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)