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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 37: व्यासजी तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाराज युधिष्ठिरका नगरमें प्रवेश
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श्लोक 15
श्लोक
12.37.15
यस्य ब्रह्मर्षय: पुण्या नित्यमासन् सभासद:।
यस्य नाविदितं किंचिज्ज्ञानयज्ञेषु विद्यते॥ १५॥
अनुवाद
धर्मात्मा ब्रह्मर्षि सदैव उनके दरबार के सदस्य रहे हैं। ज्ञानयज्ञ में ऐसी कोई बात नहीं है जो वे न जानते हों।॥15॥
‘The pious Brahmarshi has always been a member of his court. There is nothing in the sacrifice of knowledge that he does not know.॥ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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