आसीत् तु मे भोगपते संशय: पुण्यसंचये।
सोऽहमुञ्छव्रतं साधो चरिष्याम्यर्थसाधनम्॥ ९॥
अनुवाद
नागराज! मुझे पुण्य संचय के विषय में संदेह था। मैं निश्चय नहीं कर पा रहा था कि किस विधि को अपनाऊँ। किन्तु अब वह संदेह दूर हो गया है। साधु! अब मैं केवल अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए उञ्चव्रत का व्रत करूँगा।॥9॥
Nagaraj! I had doubts about the accumulation of merits. I was unable to decide which method to adopt. But now that doubt has been dispelled. Sadhu! Now I will only perform the vow of Uñchhavrat for the attainment of my desired goal.॥ 9॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥