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mahabharat 12.364.5: हे ब्रह्मर्षि! आप मुझसे प्रेम करते हैं; अतः वृक्ष के नीचे बैठे हुए पथिक की भाँति मुझे देखकर चले जाना आपके लिए उचित नहीं है॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.364: ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 364: ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.364.5 
न हि मां केवलं दृष्ट्वा त्यक्त्वा प्रणयवानिह।
गन्तुमर्हसि विप्रर्षे वृक्षमूलगतो यथा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि! आप मुझसे प्रेम करते हैं; अतः वृक्ष के नीचे बैठे हुए पथिक की भाँति मुझे देखकर चले जाना आपके लिए उचित नहीं है॥5॥
 
O Brahmarshi! You love me; therefore it is not right for you to just see me and go away like a traveller sitting under a tree. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)