श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 364: ब्राह्मणका नागराजसे बातचीत करके और उञ्छव्रतके पालनका निश्चय करके अपने घरको जानेके लिये नागराजसे विदा माँगना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.364.3 
नाग उवाच
अनुक्त्वा हृद्‍गतं कार्यं क्वेदानीं प्रस्थितो भवान्।
उच्यतां द्विज यत् कार्यं यदर्थं त्वमिहागत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
सर्प बोला - "ब्राह्मण! तुमने अभी तक मुझे अपने मन की बात नहीं बताई, फिर अब कहाँ जा रहे हो? तुम यहाँ किस काम से आए हो, यह बताओ।"
 
The serpent said - Brahmin! You have not yet told me what is on your mind, then where are you going now? Tell me the work for which you have come here.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)