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mahabharat 12.362.2: सर्प बोला, "हे ब्रह्मन्! भगवान सूर्य अनेक आश्चर्यों के धाम हैं; क्योंकि तीनों लोकों के समस्त प्राणी उन्हीं से प्रेरित होकर अपने-अपने कर्म करते हैं।"   |   mahabharat अध्याय 12.362: नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 362: नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.362.2 
नाग उवाच
आश्चर्याणामनेकानां प्रतिष्ठा भगवान् रवि:।
यतो भूता: प्रवर्तन्ते सर्वे त्रैलोक्यसम्मता:॥ २॥
 
 
अनुवाद
सर्प बोला, "हे ब्रह्मन्! भगवान सूर्य अनेक आश्चर्यों के धाम हैं; क्योंकि तीनों लोकों के समस्त प्राणी उन्हीं से प्रेरित होकर अपने-अपने कर्म करते हैं।"
 
The serpent said, "O Brahman! Lord Surya is the abode of many wonders; because all the creatures in the three worlds are inspired by him and act in their respective actions."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)