श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 360: पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.360.7 
हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद् विघ्नं न प्रतिपालयेत्।
तुल्योऽप्यभिजने जातो न कश्चित् पर्युपासते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वे आपके दर्शन के अतिरिक्त अन्य किसी भी वस्तु को बाधा समझते हैं; अतः उन्हें उस बाधा का सामना नहीं करना चाहिए। कुलीन कुल में उत्पन्न होकर आपके समान कोई भी उत्तम गृहस्थ अतिथि की उपेक्षा करके घर में नहीं बैठता। ॥7॥
 
They consider anything other than your darshan as an obstacle; hence, they should not face that obstacle. Born in a noble family, no good householder like you ignores a guest and sits in the house. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)