श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 360: पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.360.20 
एष तत्रैव गच्छामि यत्र तिष्ठत्यसौ द्विज:।
सर्वथा चोक्तवान् वाक्यं स कृतार्थ: प्रयास्यति॥ २०॥
 
 
अनुवाद
लो, अब मैं उस स्थान पर जा रहा हूँ जहाँ वह ब्राह्मण देवता विराजमान हैं। वे जो कहेंगे, मैं वही करूँगा। वे पूर्णतः संतुष्ट होकर ही यहाँ से जाएँगे।
 
Here, now I am going to the place where that Brahmin deity is present. I will do whatever he says. He will go from here after being completely satisfied.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने षष्टॺधिकत्रिशततमोऽध्याय:॥ ३६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३६०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)