श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 360: पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.360.18 
तदेष तपसां शत्रु: श्रेयसां विनिपातक:।
निगृहीतो मया रोष: श्रुत्वैवं वचनं तव॥ १८॥
 
 
अनुवाद
इसलिए आज आपकी बात सुनकर मैंने अपने क्रोध को, जो तपस्या का शत्रु है और कल्याण के मार्ग से विचलित करने वाला है, वश में कर लिया है ॥18॥
 
Therefore, after listening to you today, I have controlled my anger, which is the enemy of austerity and which deviates from the path of welfare. ॥18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)