श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 360: पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.360.13 
नाग उवाच
अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान्।
रोष: संकल्पज: साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया॥ १३॥
 
 
अनुवाद
सर्प ने कहा- साध्वी! मुझे अहंकार के कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोष के कारण महान क्रोध है। अब आपने अपने वचनरूपी अग्नि से मेरे उस क्रोध को जलाकर भस्म कर दिया है॥13॥
 
The snake said – Sadhvi! I am not proud because of ego; But there is great anger due to caste-fault. Now you have burnt that anger of mine to ashes with the fire of your words. 13॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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