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श्लोक 12.360.13  |
नाग उवाच
अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान्।
रोष: संकल्पज: साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| सर्प ने कहा- साध्वी! मुझे अहंकार के कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोष के कारण महान क्रोध है। अब आपने अपने वचनरूपी अग्नि से मेरे उस क्रोध को जलाकर भस्म कर दिया है॥13॥ |
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| The snake said – Sadhvi! I am not proud because of ego; But there is great anger due to caste-fault. Now you have burnt that anger of mine to ashes with the fire of your words. 13॥ |
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