श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 360: पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.360.1 
नाग उवाच
अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि।
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते॥ १॥
 
 
अनुवाद
सर्प ने पूछा, "हे देवी! आपने ब्राह्मण रूप में किसे देखा है? वह ब्राह्मण मनुष्य है या देवता?"॥1॥
 
The serpent asked, "O Goddess with a pure smile! Whom have you seen in the form of a Brahmin? Is that Brahmin a human being or a god?"॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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