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mahabharat 12.36.49: मूर्ख ब्राह्मण देवताओं के यज्ञ और पितरों के श्राद्ध का नाश करने वाला है। वह धन का अपहरण करने वाला शत्रु है। वह दान देने वालों को उत्तम लोक में नहीं ले जा सकता। 49॥   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.36.49 
देवतानां पितॄणां च हव्यकव्यविनाशक:।
शत्रुरर्थहरो मूर्खो न लोकान् प्राप्तुमर्हति॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
मूर्ख ब्राह्मण देवताओं के यज्ञ और पितरों के श्राद्ध का नाश करने वाला है। वह धन का अपहरण करने वाला शत्रु है। वह दान देने वालों को उत्तम लोक में नहीं ले जा सकता। 49॥
 
'A foolish Brahmin is the one who destroys the Yagya of the Gods and the Shraddha of the ancestors. He is an enemy who steals wealth. He cannot take those who donate to the best world. 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)