श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.36.47 
यथा षण्ढोऽफल: स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला।
शकुनिर्वाप्यपक्ष: स्यान्निर्मन्त्रो ब्राह्मणस्तथा॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जैसे नपुंसक पुरुष स्त्रियों के पास जाकर निष्फल हो जाता है, गाय गौ के साथ सहवास करने पर भी कोई फल नहीं दे सकती और जैसे पंखहीन पक्षी उड़ नहीं सकता, वैसे ही वेदमंत्रों के ज्ञान से रहित ब्राह्मण भी निकम्मा है ॥47॥
 
Just as an impotent man becomes fruitless by going to women, a cow cannot bear any fruit even if it is mated with a cow and just as a bird without wings cannot fly, similarly a Brahmin devoid of the knowledge of Vedic mantras is also useless. ॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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