श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.36.44 
न वै देयमनुक्रोशाद् दीनायाप्यपकारिणे।
आप्ताचरित इत्येव धर्म इत्येव वा पुन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
परंतु यदि कोई दूसरों का अनिष्ट कर रहा हो, तो चाहे वह दरिद्र ही क्यों न हो, दया करके उसे कुछ नहीं देना चाहिए। यही सभ्य पुरुषों का आचरण है और यही धर्म है॥ 44॥
 
‘But if someone is doing harm to others, even if he is poor, one should not give him anything out of pity. This is the behavior of the cultured and this is Dharma.॥ 44॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas