श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  12.36.42 
कपाले यद्वदाप: स्यु: श्वदृतौ च यथा पय:।
आश्रयस्थानदोषेण वृत्तहीने तथा श्रुतम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जैसे मनुष्य की खोपड़ी में रखा हुआ जल और कुत्ते की खाल में रखा हुआ दूध आश्रय के दोषों के कारण अशुद्ध हो जाता है, वैसे ही कृतघ्न ब्राह्मण का शास्त्रज्ञान भी आश्रय के दोषों के कारण दूषित हो जाता है ॥ 42॥
 
Just as the water stored in a human skull and the milk stored in a dog's skin become impure due to the defects in the shelter, so too the knowledge of scriptures of an ungrateful Brahmin becomes contaminated due to the defects in the shelter. ॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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