श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.36.41 
काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते।
तप:स्वाध्यायचारित्रैरेवं हीन: प्रतिग्रही॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
जैसे गीली लकड़ी से ढकी हुई अग्नि नहीं जला सकती, वैसे ही तप, स्वाध्याय और सदाचार से रहित ब्राह्मण यदि दान ग्रहण कर ले, तो उसे पचा नहीं सकता ॥ 41॥
 
Just as a fire covered with wet wood cannot burn, similarly if a Brahmin who is devoid of austerity, self-study and good conduct accepts charity, he cannot digest it. ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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