काष्ठैरार्द्रैर्यथा वह्निरुपस्तीर्णो न दीप्यते।
तप:स्वाध्यायचारित्रैरेवं हीन: प्रतिग्रही॥ ४१॥
अनुवाद
जैसे गीली लकड़ी से ढकी हुई अग्नि नहीं जला सकती, वैसे ही तप, स्वाध्याय और सदाचार से रहित ब्राह्मण यदि दान ग्रहण कर ले, तो उसे पचा नहीं सकता ॥ 41॥
Just as a fire covered with wet wood cannot burn, similarly if a Brahmin who is devoid of austerity, self-study and good conduct accepts charity, he cannot digest it. ॥ 41॥