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mahabharat 12.36.35-36h: जैसे गृहत्यागी संन्यासी घर से विरक्त हो जाता है, वैसे ही गृहस्थ को भी आसक्ति और ममता का त्याग करके घर में ही रहना चाहिए। जो पुरुष इस प्रकार सदाचार का पालन करते हुए अपनी प्रिय पत्नी के साथ घर में रहता है, वह धर्म का पूर्ण फल प्राप्त करता है॥ 35 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 35-36h
 
 
श्लोक  12.36.35-36h 
यथा प्रव्रजितो भिक्षुस्तथैव स्वे गृहे वसेत्॥ ३५॥
एवंवृत्त: प्रियैर्दारै: संवसन् धर्ममाप्नुयात्।
 
 
अनुवाद
जैसे गृहत्यागी संन्यासी घर से विरक्त हो जाता है, वैसे ही गृहस्थ को भी आसक्ति और ममता का त्याग करके घर में ही रहना चाहिए। जो पुरुष इस प्रकार सदाचार का पालन करते हुए अपनी प्रिय पत्नी के साथ घर में रहता है, वह धर्म का पूर्ण फल प्राप्त करता है॥ 35 1/2॥
 
‘Just as a sanyasi who has renounced his home is detached from his home, similarly a householder should also stay at home by giving up attachment and affection. One who lives at home with his beloved wife while following good conduct in this manner, attains the full fruits of Dharma.॥ 35 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)