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mahabharat 12.36.33-34h: खीर, खिचड़ी, फलों का गूदा और केक गृहस्थ ब्राह्मणों के खाने के योग्य नहीं हैं, यदि वे देवताओं के निमित्त तैयार न किए गए हों।   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 33-34h
 
 
श्लोक  12.36.33-34h 
पायसं कृसरं मांसमपूपाश्च वृथाकृता:॥ ३३॥
अपेयाश्चाप्यभक्ष्याश्च ब्राह्मणैर्गृहमेधिभि:।
 
 
अनुवाद
खीर, खिचड़ी, फलों का गूदा और केक गृहस्थ ब्राह्मणों के खाने के योग्य नहीं हैं, यदि वे देवताओं के निमित्त तैयार न किए गए हों।
 
'Kheer, Khichdi, fruit pulp and cakes are not fit for consumption by householder Brahmins if they are not prepared for the sake of the gods. 33 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)