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mahabharat 12.36.29-30h: अग्निशोमय होम विशेष से पहले यज्ञ की दीक्षा लेने वाले का भोजन त्याज्य है। कंजूस, यज्ञ विक्रेता, बढ़ई, मोची या मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य या चौकीदार का भोजन भी खाने योग्य नहीं है। 29 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  12.36.29-30h 
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रतुविक्रयिकस्य च।
तक्ष्णश्चर्मावकर्तुश्च पुंश्चल्या रजकस्य च॥ २९॥
चिकित्सकस्य यच्चान्नमभोज्यं रक्षिणस्तथा।
 
 
अनुवाद
अग्निशोमय होम विशेष से पहले यज्ञ की दीक्षा लेने वाले का भोजन त्याज्य है। कंजूस, यज्ञ विक्रेता, बढ़ई, मोची या मोची, व्यभिचारिणी स्त्री, धोबी, वैद्य या चौकीदार का भोजन भी खाने योग्य नहीं है। 29 1/2॥
 
'The food of one who has taken the initiation of Yagya is unacceptable before the Agnishomiya Homa Vishesh. The food of a miser, a yagya seller, a carpenter, a cobbler or a cobbler, an adulterous woman, a washerman, a doctor or a watchman is also not fit to eat. 29 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)