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mahabharat 12.36.20: "यदि प्रायश्चित की आवश्यकता हो और धर्म के निर्णय में संदेह उत्पन्न हो, तो वेद और शास्त्रों को जानने वाले दस ब्राह्मण अथवा धर्म का निरन्तर विचार करने वाले तीन ब्राह्मण जो कुछ भी चर्चा करके कहें, उसे ही धर्म मानना ​​चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.36.20 
दश वा वेदशास्त्रज्ञास्त्रयो वा धर्मपाठका:।
यद् ब्रूयु: कार्य उत्पन्ने स धर्मो धर्मसंशये॥ २०॥
 
 
अनुवाद
"यदि प्रायश्चित की आवश्यकता हो और धर्म के निर्णय में संदेह उत्पन्न हो, तो वेद और शास्त्रों को जानने वाले दस ब्राह्मण अथवा धर्म का निरन्तर विचार करने वाले तीन ब्राह्मण जो कुछ भी चर्चा करके कहें, उसे ही धर्म मानना ​​चाहिए।
 
"If there is a need for atonement and doubt arises in the decision about Dharma, then whatever ten Brahmins who know the Vedas and the scriptures or three Brahmins who constantly ponder over Dharma say after discussing the matter, that should be accepted as Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)