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mahabharat 12.36.16: यदि क्रोध और मोह के वश होकर मन को प्रिय या अप्रिय लगने वाले अशुभ कर्म हो जाएँ, तो शास्त्रों की दृष्टि से उनके निवारण के लिए उपवास आदि द्वारा शरीर को सुखाना ही उपयुक्त प्रायश्चित माना गया है। इसके अतिरिक्त पवित्र भोजन, मंत्रजप तथा अन्य प्रायश्चितों से भी क्रोध आदि के कारण हुए पाप नष्ट हो जाते हैं।॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.36.16 
क्रोधमोहकृते चैव दृष्टान्तागमहेतुभि:।
शरीराणामुपक्लेशो मनसश्च प्रियाप्रिये।
तदौषधैश्च मन्त्रैश्च प्रायश्चित्तैश्च शाम्यति॥ १६॥
 
 
अनुवाद
यदि क्रोध और मोह के वश होकर मन को प्रिय या अप्रिय लगने वाले अशुभ कर्म हो जाएँ, तो शास्त्रों की दृष्टि से उनके निवारण के लिए उपवास आदि द्वारा शरीर को सुखाना ही उपयुक्त प्रायश्चित माना गया है। इसके अतिरिक्त पवित्र भोजन, मंत्रजप तथा अन्य प्रायश्चितों से भी क्रोध आदि के कारण हुए पाप नष्ट हो जाते हैं।॥16॥
 
‘If under the influence of anger and temptation, inauspicious actions are committed which are pleasant or unpleasant to the mind, then from the point of view of the scriptures, drying the body through fasting etc. is considered to be the only suitable atonement for their prevention. Apart from this, the sins committed due to anger etc. are also expunged by eating sacred food, chanting mantras and other atonements. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)