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mahabharat 12.36.15: यदि यहाँ कोई अशुभ कार्य स्वेच्छा से, अपने जीवन के विषय में कोई संदेह न होने पर अथवा किसी प्रत्यक्ष लाभ के लिए किया जाए, तो उससे होने वाले पाप को दूर करने के लिए प्रायश्चित का विधान है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.36.15 
ऊर्ध्वं भवति संदेहादिह दृष्टार्थमेव च।
अपेक्षापूर्वकरणात् प्रायश्चित्तं विधीयते॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यदि यहाँ कोई अशुभ कार्य स्वेच्छा से, अपने जीवन के विषय में कोई संदेह न होने पर अथवा किसी प्रत्यक्ष लाभ के लिए किया जाए, तो उससे होने वाले पाप को दूर करने के लिए प्रायश्चित का विधान है ॥15॥
 
'If an inauspicious act is done here willingly when there is no doubt about one's life or for some apparent gain, then atonement is prescribed to remove the sin caused by it. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)