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mahabharat 12.36.13: वैदिक निवृत्ति-धर्म का परिणाम अमरता (मोक्ष) है और वैदिक प्रवृत्ति अर्थात् सकाम कर्म का परिणाम जन्म-मरणरूपी संसार है। सांसारिक प्रवृत्तियाँ और प्रवृत्तियाँ - यदि ये दोनों अशुभ हों तो इनका परिणाम भी अशुभ समझना चाहिए और यदि ये शुभ हों तो इनका परिणाम भी शुभ समझना चाहिए; क्योंकि ये दोनों ही शुभ और अशुभ हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 36: स्वायम्भुव मनुके कथनानुसार धर्मका स्वरूप, पापसे शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त, अभक्ष्य वस्तुओंका वर्णन तथा दानके अधिकारी एवं अनधिकारीका विवेचन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.36.13 
अप्रवृत्तेरमर्त्यत्वं मर्त्यत्वं कर्मण: फलम्।
अशुभस्याशुभं विद्याच्छुभस्य शुभमेव च।
एतयोश्चोभयो: स्यातां शुभाशुभतया तथा॥ १३॥
 
 
अनुवाद
वैदिक निवृत्ति-धर्म का परिणाम अमरता (मोक्ष) है और वैदिक प्रवृत्ति अर्थात् सकाम कर्म का परिणाम जन्म-मरणरूपी संसार है। सांसारिक प्रवृत्तियाँ और प्रवृत्तियाँ - यदि ये दोनों अशुभ हों तो इनका परिणाम भी अशुभ समझना चाहिए और यदि ये शुभ हों तो इनका परिणाम भी शुभ समझना चाहिए; क्योंकि ये दोनों ही शुभ और अशुभ हैं।
 
‘The result of Vedic non-interest (Nivritti-dharma) is immortality (moksha) and the result of Vedic trend i.e. fruitful action is the world of birth and death. Worldly tendencies and tendencies - if both of these are inauspicious then their results should also be considered inauspicious and if they are auspicious then their results should also be considered auspicious; Because both of these are auspicious and inauspicious.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)