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mahabharat 12.359.5: सर्पपत्नी बोलीं, "शिष्य का धर्म गुरु की सेवा करना है, ब्राह्मण का धर्म वेदों का पालन करना है, सेवक का धर्म स्वामी की आज्ञा का पालन करना है और राजा का धर्म अपनी प्रजा की निरन्तर रक्षा करना है।" ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.359: नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 359: नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.359.5 
नागभार्योवाच
शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदधारणम्।
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञो लोकानुपालनम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
सर्पपत्नी बोलीं, "शिष्य का धर्म गुरु की सेवा करना है, ब्राह्मण का धर्म वेदों का पालन करना है, सेवक का धर्म स्वामी की आज्ञा का पालन करना है और राजा का धर्म अपनी प्रजा की निरन्तर रक्षा करना है।" ॥5॥
 
The serpent's wife said, "The duty of a disciple is to serve his Guru, the duty of a Brahmin is to follow the Vedas, the duty of a servant is to obey his master's orders and the duty of a king is to provide constant protection to his subjects." ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)