श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 358: नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना  » 
 
 
अध्याय 358: नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना
 
श्लोक 1:  भीष्म कहते हैं - हे पुरुषश्रेष्ठ! तत्पश्चात वह ब्राह्मण गोमती नदी के तट पर रहकर निराहार रहकर तपस्या करने लगा। उसके कुछ न खाने से वहाँ रहने वाले सर्प अत्यन्त दुःखी हुए॥1॥
 
श्लोक 2:  तब सर्पराज के भाई, सम्बन्धी, स्त्री और पुत्र सभी मिलकर उस ब्राह्मण के पास गए॥2॥
 
श्लोक 3:  उन्होंने देखा कि एक ब्राह्मण गोमती नदी के तट पर एकांत स्थान पर बिना कुछ खाए-पिए, व्रत और अनुशासन का पालन करते हुए मंत्र जप रहा है।
 
श्लोक 4:  सर्पराज के सभी भाई-बन्धु, जो अपने आतिथ्य के लिए प्रसिद्ध थे, उस ब्राह्मण के पास गए और उसकी बारंबार पूजा करके संशयरहित वाणी में बोले-॥4॥
 
श्लोक 5:  धर्मप्रेमी तपस्वी! आपको यहाँ आए छह दिन हो गए; परंतु अभी तक आप हमें भोजन लाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं॥5॥
 
श्लोक 6:  आप हमारे घर अतिथि बनकर आए हैं और हम आपकी सेवा के लिए उपस्थित हैं। आपका आतिथ्य करना हमारा कर्तव्य है; क्योंकि हम सब गृहस्थ हैं।
 
श्लोक 7:  ‘द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! अपनी भूख मिटाने के लिए हमारे द्वारा लाए गए फल, शाक, दूध या अन्न को स्वीकार कीजिए।’ 7॥
 
श्लोक 8:  इस वन में रहते हुए तुमने अन्न त्याग दिया है। इससे हमारे धर्म में बाधा आ रही है। इससे बालकों से लेकर वृद्धों तक हम सभी को बहुत कष्ट हो रहा है। ॥8॥
 
श्लोक 9:  हमारे कुल में ऐसा कोई नहीं है जिसने कभी भ्रूणहत्या की हो, जिसका बच्चा पैदा होते ही मर गया हो, जिसने झूठ बोला हो, या जो देवताओं, अतिथियों और बन्धु-बान्धवों को भोजन कराने से पहले ही उसे खा लेता हो।॥9॥
 
श्लोक 10:  ब्राह्मण बोला, "हे सर्पगण! मैं आपकी सलाह से संतुष्ट हूँ। आप सब लोग यह समझ लें कि मुझे यह भोजन मिल गया है। सर्पराज के लौटने में अब केवल आठ रात्रियाँ शेष हैं।"
 
श्लोक 11:  यदि आठ रात्रि के बाद सर्पराज न आएँ, तो मैं भोजन कर लूँगा। मैंने उनके आगमन के लिए यह व्रत किया है ॥11॥
 
श्लोक 12:  तुम लोग इस बात से व्याकुल न होओ। जिस प्रकार आए हो, उसी प्रकार घर लौट जाओ। मेरा सम्पूर्ण व्रत और अनुष्ठान सर्पराज के दर्शन के लिए ही है। अतः तुम लोग इसे भंग न करो॥12॥
 
श्लोक 13:  हे पुरुषश्रेष्ठ! ब्राह्मण के ऐसा आदेश देने पर सर्प अपने प्रयत्न में असफल होकर अपने घर लौट गए।13.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)