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श्लोक  12.357.6 
ब्राह्मण उवाच
विश्रान्तोऽभ्यर्चितश्चास्मि भवत्या श्लक्ष्णया गिरा।
द्रष्टुमिच्छामि भवति देवं नागमनुत्तमम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला, "देवी! आपने मधुर वाणी से मेरा स्वागत और पूजन किया। इससे मेरी सारी थकान दूर हो गई। अब मैं श्रेष्ठ नागदेवता के दर्शन करना चाहता हूँ।"
 
The Brahmin said—Goddess! You welcomed and worshipped me with sweet words. This removed all my tiredness. Now I want to see the supreme serpent god.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)